महिषासुर मर्दनी स्त्रोत
अयि गिरिनंदिनि नंदितमेदिनि विश्वविनोदिनि नंदनुते ।
गिरिवर विंध्य शिरोधिनिवासिनि विष्णु विलासिनि जिष्णुनुते ॥
गिरिवर विंध्य शिरोधिनिवासिनि विष्णु विलासिनि जिष्णुनुते ॥
अयि - हे , गिरि - पर्वत , नंदिनी - पुत्री , नंदिता - प्रसन्नता, मेदिनी - करने वाली, विश्व - जग, विनोदिनी - हर्षित करने वाली, नन्द - शिव के प्रमुख गण, नुते - पूजित, गिरि - पर्वत, वर - महान, विन्ध्य - एक पर्वत श्रृखला, शिर - शिखर, निवासिनी - रहने वाली, विष्णु - सर्व, विलासिनी - व्याप्त, जिष्णु - विजय चाहने वाले, नुते - पूजित ।
अनुवाद :- हे पर्वत पुत्री ! प्रसन्नता करने वाली ! जग हर्षित करने वाली ! शिव के प्रमुख गण नंदी से पूजित ! विन्ध्य पर्वत शिखर पर निवास करने वाली ! सर्वव्याप्त देवी जगदम्बा आप विजय चाहने वालों से पूजित है !
भावार्थ :- उप्युक्त श्लोक में माँ भगवती को विभ्भिन विशेषणों से सम्बोधित करते हुए उनकी वंदना की गई है । श्लोक में 'न' वर्ण की प्रधानता सहजतापूर्वक देखी जा सकती है । 'न' मुख्यतया प्रतीक है देवी के सृजनात्मक रूप का जो 'नवयुग' निर्माण के अवसर पर अवतरित होता है ।
भगवती - देवी दुर्गा , शितिकंठ - नीले गले वाले अर्थार्त विषपायी भगवान शिव , कुटुम्बिनी - कुलवधू , भूरी - वृहद / विशाल , कुटुम्ब - कुल , भूरी - बहुत , कृते - करना , महिषासुर - भैसे के रूप का असुर , मर्दिनी - नष्ट करने वाली , रम्य - रमणीय / सुंदर , कपर्दी - उलझे केश वाले अर्थार्त भगवान शिव , कपर्दिनि - शिव पत्नी - माँ शक्ति , शैल - पर्वत राज हिमालय , सुता - पुत्री ।
अनुवाद :- हे देवी ! हे विषपायी भगवान शिव की अर्धांगनी ! आपके आशीर्वाद से शिव कुटुंब इतना विशाल हो गया । महिष रुपी विकट असुर का सर्वनाश करने वाली ! हे हिमालय पुत्री ! हे माँ शक्ति ! आपकी जय हो ! आपकी जय हो ! आपकी सदा जय हो !
भावार्थ :- माँ शक्ति की महिमा अपरम्पार है । माता ने भैसे के समान अत्यंत विकराल बलशाली असुर का नाश करके देवताओ को अभय प्रदान किया । आप वीतरागी वैरागी विषपायी शिव के विशाल कुल (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ) का पोषण करने वाली हो । हे पर्वत श्रेष्ठ हिमालय की पुत्री ! हे देवी ! हमारी कामना है कि आपकी सदा जय हो ! आपकी सदा विजय हो !
अनुवाद :- हे पर्वत पुत्री ! प्रसन्नता करने वाली ! जग हर्षित करने वाली ! शिव के प्रमुख गण नंदी से पूजित ! विन्ध्य पर्वत शिखर पर निवास करने वाली ! सर्वव्याप्त देवी जगदम्बा आप विजय चाहने वालों से पूजित है !
भावार्थ :- उप्युक्त श्लोक में माँ भगवती को विभ्भिन विशेषणों से सम्बोधित करते हुए उनकी वंदना की गई है । श्लोक में 'न' वर्ण की प्रधानता सहजतापूर्वक देखी जा सकती है । 'न' मुख्यतया प्रतीक है देवी के सृजनात्मक रूप का जो 'नवयुग' निर्माण के अवसर पर अवतरित होता है ।
भगवति हे शितिकंठकुटुम्बिनी भूरि कुटुम्बिनी भूरि कृते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१॥
भगवती - देवी दुर्गा , शितिकंठ - नीले गले वाले अर्थार्त विषपायी भगवान शिव , कुटुम्बिनी - कुलवधू , भूरी - वृहद / विशाल , कुटुम्ब - कुल , भूरी - बहुत , कृते - करना , महिषासुर - भैसे के रूप का असुर , मर्दिनी - नष्ट करने वाली , रम्य - रमणीय / सुंदर , कपर्दी - उलझे केश वाले अर्थार्त भगवान शिव , कपर्दिनि - शिव पत्नी - माँ शक्ति , शैल - पर्वत राज हिमालय , सुता - पुत्री ।
अनुवाद :- हे देवी ! हे विषपायी भगवान शिव की अर्धांगनी ! आपके आशीर्वाद से शिव कुटुंब इतना विशाल हो गया । महिष रुपी विकट असुर का सर्वनाश करने वाली ! हे हिमालय पुत्री ! हे माँ शक्ति ! आपकी जय हो ! आपकी जय हो ! आपकी सदा जय हो !
भावार्थ :- माँ शक्ति की महिमा अपरम्पार है । माता ने भैसे के समान अत्यंत विकराल बलशाली असुर का नाश करके देवताओ को अभय प्रदान किया । आप वीतरागी वैरागी विषपायी शिव के विशाल कुल (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ) का पोषण करने वाली हो । हे पर्वत श्रेष्ठ हिमालय की पुत्री ! हे देवी ! हमारी कामना है कि आपकी सदा जय हो ! आपकी सदा विजय हो !
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते ।
त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ॥
अनुवाद :- देवताओ पर वरदानो की वर्षा करने वाली ! दानवो पर निरंतर कठोर प्रहार करने वाली ! हे देवी आप हँसते - हँसते ही निकृष्ठ कुरूप असुरों का अस्तित्व मिटा देती हो ! हे जगजननी माँ भवानी आप ही तीनो लोकों का पालन करने वाली हो ! परम प्रकाश आत्म स्वरूप भगवान शिव की कल्याणमयी इच्छाओ को क्रियान्वित करने वाली परम शक्ति हो ! सभी दुखदायी विनाशकारी पापों से मुक्ति प्रदान करने वाली हो ! संग्राम में हुंकारकर दानव सेना में भय व्याप्त कर देना वाली हो !
भावार्थ :- उप्युक्त श्लोक में माँ भगवती की स्तुति करते हुए कहा गया है कि हे देवी ! आप ही के आशीर्वाद से देवता दानवो पर विजय प्राप्त करने में सफल होते है । आप ही वह परम कल्याणमयी शक्ति है जो शिव इच्छा से जगत का पोषण करने और दुःख हरने के लिए क्रियान्वित है । विपरीत कार्य करने वाले, जगत के नाश के लिए प्रवृत दुष्ट असुरों की सेना में आपकी गर्जन मात्र से भय व्याप्त हो जाता है । हे देवी विन्ध्यवासिनी यह आपकी दयालुता ही है कि इन अशोभनीय असुरों के अभद्र भाव देखकर भी आपके सूर्य के सामान देदीप्यमान मुखमंडल की कांति मलीन नहीं होती है ।
to be continued...
त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ॥
सुर - देवता , वर - वरदान / आशीर्वाद , वर्षिणी - प्रचुरता में देने वाली , दुर्धर - जिसका प्रतिरोध करना कठिन हो अर्थार्त दानव , धर्षिणि - हमलो की बौछार करने वाली , दुर्मुख - कुरूप मुख वाले , मर्षिणि - धैर्यपूर्वक देखने वाली / बर्दाश्त करने वाली , हर्ष - प्रफुल्लित , रते - रहने वाली , त्रि - तीन , भुवन - लोक , पोषिणि - पालन करने वाली , शंकर - भगवान शिव , तोषिणि - संतुष्ट करने वाली , किल्बिष - पाप / रोग , मोषिणि - मुक्त करने वाली , घोष - नाद / गर्जन / भयंकर ध्वनि ।
अनुवाद :- देवताओ पर वरदानो की वर्षा करने वाली ! दानवो पर निरंतर कठोर प्रहार करने वाली ! हे देवी आप हँसते - हँसते ही निकृष्ठ कुरूप असुरों का अस्तित्व मिटा देती हो ! हे जगजननी माँ भवानी आप ही तीनो लोकों का पालन करने वाली हो ! परम प्रकाश आत्म स्वरूप भगवान शिव की कल्याणमयी इच्छाओ को क्रियान्वित करने वाली परम शक्ति हो ! सभी दुखदायी विनाशकारी पापों से मुक्ति प्रदान करने वाली हो ! संग्राम में हुंकारकर दानव सेना में भय व्याप्त कर देना वाली हो !
भावार्थ :- उप्युक्त श्लोक में माँ भगवती की स्तुति करते हुए कहा गया है कि हे देवी ! आप ही के आशीर्वाद से देवता दानवो पर विजय प्राप्त करने में सफल होते है । आप ही वह परम कल्याणमयी शक्ति है जो शिव इच्छा से जगत का पोषण करने और दुःख हरने के लिए क्रियान्वित है । विपरीत कार्य करने वाले, जगत के नाश के लिए प्रवृत दुष्ट असुरों की सेना में आपकी गर्जन मात्र से भय व्याप्त हो जाता है । हे देवी विन्ध्यवासिनी यह आपकी दयालुता ही है कि इन अशोभनीय असुरों के अभद्र भाव देखकर भी आपके सूर्य के सामान देदीप्यमान मुखमंडल की कांति मलीन नहीं होती है ।
दनुज निरोषिणि दितिसुत रोषिणि दुर्मद शोषिणि सिन्धुसुते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥२॥
दनुज - दनु के पुत्र अर्थात दानव , निरोषिणि - रोष युक्त , दितिसुत - दिति के पुत्र अर्थात दैत्य , दुर्मद - मिथ्या अहंकार युक्त , शोषिणि - ग्रसने वाली , सिन्धुसुते - समुंद्र की पुत्री ।
अयि जगदंब मदंब कदंब वनप्रिय वासिनि हासरते ।
शिखरि शिरोमणि तुङ्ग हिमालय शृङ्ग निजालय मध्यगते ॥
मधु मधुरे मधु कैटभ गंजिनि कैटभ भंजिनि रासरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥३॥
अयि शतखण्ड विखण्डित रुण्ड वितुण्डित शुण्ड गजाधिपते ।
रिपु गज गण्ड विदारण चण्ड पराक्रम शुण्ड मृगाधिपते ॥
निज भुज दण्ड निपातित खण्ड विपातित मुण्ड भटाधिपते ।
रिपु गज गण्ड विदारण चण्ड पराक्रम शुण्ड मृगाधिपते ॥
निज भुज दण्ड निपातित खण्ड विपातित मुण्ड भटाधिपते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥४॥
अयि रण दुर्मद शत्रु वधोदित दुर्धर निर्जर शक्तिभृते ।
चतुर विचार धुरीण महाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ॥
दुरित दुरीह दुराशय दुर्मति दानवदूत कृतांतमते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥५॥
अयि शरणागत वैरि वधूवर वीर वराभय दायकरे ।
त्रिभुवन मस्तक शूल विरोधि शिरोधि कृतामल शूलकरे ॥
दुमिदुमि तामर दुंदुभिनाद महो मुखरीकृत तिग्मकरे ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥६॥
अयि निज हुँकृति मात्र निराकृत धूम्र विलोचन धूम्र शते ।
समर विशोषित शोणित बीज समुद्भव शोणित बीज लते ॥
शिव शिव शुंभ निशुंभ महाहव तर्पित भूत पिशाचरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥७॥
धनुरनु संग रणक्षणसंग परिस्फुर दंग नटत्कटके ।
कनक पिशंग पृषत्क निषंग रसद्भट शृङ्ग हतावटुके ॥
कृत चतुरंग बलक्षिति रंग घटद्बहुरंग रटद्बटुके ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥८॥
अयि रण दुर्मद शत्रु वधोदित दुर्धर निर्जर शक्तिभृते ।
चतुर विचार धुरीण महाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ॥
दुरित दुरीह दुराशय दुर्मति दानवदूत कृतांतमते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥५॥
अयि शरणागत वैरि वधूवर वीर वराभय दायकरे ।
त्रिभुवन मस्तक शूल विरोधि शिरोधि कृतामल शूलकरे ॥
दुमिदुमि तामर दुंदुभिनाद महो मुखरीकृत तिग्मकरे ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥६॥
अयि निज हुँकृति मात्र निराकृत धूम्र विलोचन धूम्र शते ।
समर विशोषित शोणित बीज समुद्भव शोणित बीज लते ॥
शिव शिव शुंभ निशुंभ महाहव तर्पित भूत पिशाचरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥७॥
धनुरनु संग रणक्षणसंग परिस्फुर दंग नटत्कटके ।
कनक पिशंग पृषत्क निषंग रसद्भट शृङ्ग हतावटुके ॥
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥८॥
















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