बृहस्पतिवार, 3 जून 2010

महिषासुर मर्दनी स्त्रोत

 
महिषासुर मर्दनी स्त्रोत
mahishasura mardini durga
अयि गिरिनंदिनि नंदितमेदिनि विश्वविनोदिनि नंदनुते ।
गिरिवर विंध्य शिरोधिनिवासिनि विष्णु विलासिनि जिष्णुनुते

अयि - हे , गिरि - पर्वत , नंदिनी - पुत्री , नंदिता - प्रसन्नता, मेदिनी - करने वाली, विश्व - जग, विनोदिनी - हर्षित करने वाली, नन्द - शिव के प्रमुख गण, नुते - पूजित, गिरि - पर्वत, वर - महान, विन्ध्य - एक पर्वत श्रृखला, शिर - शिखर, निवासिनी - रहने वाली, विष्णु - सर्व, विलासिनी - व्याप्त, जिष्णु - विजय चाहने वाले, नुते - पूजित ।

 अनुवाद :- हे पर्वत पुत्री ! प्रसन्नता करने वाली ! जग हर्षित करने वाली ! शिव के प्रमुख गण नंदी से पूजित ! विन्ध्य पर्वत शिखर पर निवास करने वाली ! सर्वव्याप्त देवी जगदम्बा आप विजय चाहने वालों से पूजित है !

 भावार्थ :- उप्युक्त श्लोक में माँ भगवती को विभ्भिन विशेषणों से सम्बोधित करते हुए  उनकी वंदना की गई है । श्लोक में 'न' वर्ण की प्रधानता सहजतापूर्वक देखी जा सकती है । 'न' मुख्यतया प्रतीक है देवी के  सृजनात्मक रूप का जो 'नवयुग' निर्माण के अवसर पर अवतरित होता है ।


god shiv mahishasura mardini durga
 भगवति हे शितिकंठकुटुम्बिनी भूरि कुटुम्बिनी भूरि कृते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि  शैलसुते

भगवती - देवी दुर्गा , शितिकंठ - नीले गले वाले अर्थार्त विषपायी भगवान शिव , कुटुम्बिनी - कुलवधू , भूरी - वृहद / विशाल , कुटुम्ब - कुल , भूरी - बहुत , कृते - करना , महिषासुर - भैसे के रूप का असुर , मर्दिनी - नष्ट करने वाली , रम्य - रमणीय / सुंदर , कपर्दी - उलझे केश वाले अर्थार्त भगवान शिव , कपर्दिनि - शिव पत्नी - माँ शक्ति , शैल - पर्वत राज हिमालय , सुता - पुत्री ।

अनुवाद :- हे देवी ! हे विषपायी भगवान शिव की अर्धांगनी ! आपके आशीर्वाद से शिव कुटुंब इतना विशाल हो गया । महिष रुपी विकट असुर का सर्वनाश करने वाली ! हे हिमालय पुत्री ! हे माँ शक्ति ! आपकी जय हो ! आपकी जय हो ! आपकी सदा जय हो !

भावार्थ :- माँ शक्ति की महिमा अपरम्पार है । माता ने भैसे के समान अत्यंत विकराल बलशाली असुर का नाश करके देवताओ को अभय प्रदान किया । आप वीतरागी वैरागी विषपायी शिव के विशाल कुल (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ) का पोषण करने वाली हो ।  हे पर्वत श्रेष्ठ हिमालय की पुत्री ! हे देवी ! हमारी कामना है कि आपकी सदा जय हो ! आपकी सदा विजय हो !

mahishasura mardini durga
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते ।
त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ॥

सुर - देवता , वर - वरदान / आशीर्वाद , वर्षिणी - प्रचुरता में देने वाली , दुर्धर - जिसका प्रतिरोध करना कठिन हो अर्थार्त दानव , धर्षिणि - हमलो की बौछार करने वाली , दुर्मुख - कुरूप मुख वाले , मर्षिणि - धैर्यपूर्वक देखने वाली / बर्दाश्त करने वाली , हर्ष - प्रफुल्लित , रते - रहने वाली , त्रि - तीन , भुवन - लोक , पोषिणि - पालन करने वाली , शंकर - भगवान शिव , तोषिणि - संतुष्ट करने वाली , किल्बिष - पाप / रोग , मोषिणि - मुक्त करने वाली , घोष - नाद / गर्जन / भयंकर ध्वनि । 

अनुवाद :- देवताओ पर वरदानो की वर्षा करने वाली ! दानवो पर निरंतर कठोर प्रहार करने वाली ! हे देवी  आप हँसते - हँसते ही निकृष्ठ कुरूप असुरों का अस्तित्व मिटा देती हो ! हे जगजननी माँ भवानी आप ही तीनो लोकों का पालन करने वाली हो  ! परम प्रकाश आत्म स्वरूप भगवान शिव की कल्याणमयी इच्छाओ को क्रियान्वित करने वाली परम शक्ति हो ! सभी दुखदायी विनाशकारी पापों से मुक्ति प्रदान करने वाली हो ! संग्राम में हुंकारकर दानव सेना में भय व्याप्त कर देना वाली हो !

भावार्थ :-  उप्युक्त श्लोक में माँ भगवती की स्तुति करते हुए कहा गया है कि हे देवी ! आप ही के आशीर्वाद से देवता दानवो पर विजय प्राप्त करने में सफल होते है । आप ही वह परम कल्याणमयी शक्ति है जो शिव इच्छा से जगत का पोषण करने और दुःख हरने के लिए क्रियान्वित है । विपरीत कार्य करने वाले, जगत के नाश के लिए प्रवृत दुष्ट असुरों की सेना में आपकी गर्जन मात्र से भय व्याप्त हो जाता है ।  हे देवी विन्ध्यवासिनी यह आपकी दयालुता ही है कि इन अशोभनीय असुरों के अभद्र भाव देखकर भी आपके सूर्य के सामान देदीप्यमान मुखमंडल की कांति मलीन नहीं होती है ।

mahishasura mardini durga
दनुज  निरोषिणि दितिसुत रोषिणि दुर्मद शोषिणि सिन्धुसुते । 
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि  शैलसुते

दनुज - दनु के पुत्र अर्थात दानव , निरोषिणि - रोष युक्त , दितिसुत - दिति के पुत्र अर्थात दैत्य , दुर्मद - मिथ्या अहंकार युक्त , शोषिणि - ग्रसने वाली , सिन्धुसुते - समुंद्र की पुत्री । 

mahishasura mardini durga
 अयि जगदंब मदंब कदंब वनप्रिय वासिनि हासरते । 
 शिखरि शिरोमणि तुङ्ग हिमालय शृङ्ग निजालय मध्यगते

mahishasura mardini durga
मधु मधुरे मधु कैटभ गंजिनि कैटभ भंजिनि रासरते । 
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि  शैलसुते ॥३

mahishasura mardini durga
अयि शतखण्ड विखण्डित रुण्ड वितुण्डित शुण्ड गजाधिपते । 
रिपु गज गण्ड विदारण चण्ड पराक्रम शुण्ड मृगाधिपते

mahishasura mardini durga
निज भुज दण्ड निपातित खण्ड विपातित मुण्ड भटाधिपते । 
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि  शैलसुते ॥४

mahishasura mardini durga
अयि रण दुर्मद शत्रु वधोदित दुर्धर निर्जर शक्तिभृते । 
चतुर विचार धुरीण महाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते 

mahishasura mardini durga
 दुरित दुरीह दुराशय दुर्मति दानवदूत कृतांतमते । 
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि  शैलसुते ॥५

mahishasura mardini durga
अयि शरणागत वैरि वधूवर वीर वराभय दायकरे । 
त्रिभुवन मस्तक शूल विरोधि शिरोधि कृतामल शूलकरे 

mahishasura mardini durga
दुमिदुमि तामर दुंदुभिनाद महो मुखरीकृत तिग्मकरे । 
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि  शैलसुते ॥६

mahishasura mardini durga
अयि निज हुँकृति मात्र निराकृत धूम्र विलोचन धूम्र शते । 
समर विशोषित शोणित बीज समुद्भव शोणित बीज लते

mahishasura mardini durga
शिव शिव शुंभ निशुंभ महाहव तर्पित भूत पिशाचरते । 
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि  शैलसुते ॥७

mahishasura mardini durga
धनुरनु संग रणक्षणसंग परिस्फुर दंग नटत्कटके । 
कनक पिशंग पृषत्क निषंग रसद्भट शृङ्ग हतावटुके 

 कृत चतुरंग बलक्षिति रंग घटद्बहुरंग रटद्बटुके । 
जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनि  शैलसुते ॥८

to be continued...

सोमवार, 31 मई 2010

श्री हरि शरणम्

sri hari vishnu narayan

सभी भक्तगणों को जय श्री कृष्ण | श्रीभगवान के श्री चरणों में यह एक तुच्छ सेवा है | प्रयास यह है कि श्रीमद भगवत गीता जी के माध्यम से देवीय भाषा संस्कृत सीखा व समझा जाए |
गीता जी के अंतिम अध्याय को मोक्ष अध्याय कहते है | अतः मरणासन्न व्यक्ति को सबसे पहले अंतिम अध्याय सुनाया जाता है | वैसे भी मृत्यु का कुछ पता नहीं कब आ जाए |अतः आरंभ अंतिम अध्याय से करेंगे | हरि ॐ |

bhagavad gita shri krishna

संन्यासस्य महाबाहो तत्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च ऋषिकेश पृथक्केशिनिषूदन
संन्यासस्य- संन्यास के , महाबाहो - हे महाबाहो ! , तत्वम् - तत्व को , इच्छामि - इच्छा करता हूँ , वेदितुम् - जानने की , त्यागस्य च - और त्याग के , ऋषिकेश - विष्णु भगवान का एक नाम , पृथक् - अलग से , केशिनिषूदन- भगवान श्रीकृष्ण जिन्होंने केशी देत्य का वध किया.

अर्जुन ने कहा - "हे महाबाहो ! हे ऋषिकेश ! हे केशिनिषूदन ! मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को पृथक् -पृथक् जानना चाहता हूँ |"
अर्जुन भगवान से प्रार्थना करता है कि जिस प्रकार उन्होंने महाबलशाली केशी असुर का नाश किया था उसी प्रकार अन्तर्यामी प्रभु उसके संदेह का भी नाश करे | संन्यास और त्याग, इन दोनों शब्दों का पृथक् -पृथक् अर्थ हो अथवा एक ही अर्थ हो, तथापि वह उन्हें पृथक् रूप से जानने की अभिलाषा करता है |

काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदु:
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणा:
काम्यानाम् कर्मणाम् - काम्य कर्मो के , न्यासम् - पूर्ण रूप से त्याग को , संन्यासम् - संन्यास , कवय: - पंडितगण , विदु: - जानते है , सर्वकर्मफलत्यागम् - सभी कर्मो के फल के त्याग को , प्राहु: - कहते है , त्यागम् - त्याग , विचक्षणा: - निपुण / विचारकुशल.

श्रीभगवान बोले - "विचारकुशल पंडितगण काम्य कर्मो के पूर्ण रूप से त्याग को संन्यास जानते है और सभी कर्मो के फल के त्याग को त्याग कहते है |"
श्रीभगवान संन्यास और त्याग - इन दोनों शब्दों के भिन्न अर्थ को बताते हुए कहते है कि प्राचीन मतानुसार काम्य कर्मो का पूर्ण रूप से त्याग संन्यास है एवं नित्य कर्मो व काम्य कर्मो के फल का त्याग कर देना त्याग है |

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त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिण:
यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यमिति चापरे
त्याज्यम् - त्यागने योग्य है , दोषवत् - दोषयुक्त है , इति - अत: , प्राहु: - कहते है , एके मनीषिन: - कोई एक पंडित/ विद्वान , यज्ञदानतप:कर्म - यज्ञ दान व तपस्या रूप कर्म , न त्याज्यम् - त्यागने योग्य नहीं है , इति - इसी प्रकार (कहते है) , च - और , अपरे - दूसरे.

"कोई एक विद्वान ऐसा कहते है कि सभी कर्म दोषयुक्त है अत: त्यागने योग्य है | और दूसरे (विद्वान) कहते है कि यज्ञ दान व तपस्या रूप कर्म त्यागने योग्य नहीं है |"
श्रीभगवान त्याग के विषय में विद्वानों में व्याप्त मतभेद बता रहे है कि कुछ विद्वानों के मत में हिंसा आदि दोषों से युक्त होने से कर्ममात्र दोषयुक्त है जबकि कुछ के मत में यज्ञ दान आदि श्रेष्ट कर्म त्याने नहीं चाहिए |

निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविध: संप्रकीर्त्तित:
निश्चयम् - निश्चय ही , श्रृणु - श्रवण करो , मे - मेरा , तत्र त्यागे - उनमे से त्याग के सम्बन्ध में , भरतसत्तम - भरतश्रेष्ठ , हि - वास्तव में , व्याघ्र - बाघ , त्रिविध: - तीन प्रकार का , संप्रकीर्त्तित: - कहा गया है .

"हे भरतश्रेष्ठ ! (पहले) त्याग के सम्बन्ध में मेरा निश्चय श्रवण करो | वास्तव में त्याग तीन प्रकार का कहा गया है|"
श्रीभगवान त्याग के गूढ़ रहस्य को प्रकट कर रहे है कि वास्तविकता में त्याग की एकमात्र परिभाषा नहीं होती , वह (त्याग) भी पुन: तीन भेद होते है |

यज्ञदानतप:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्
त्याज्यम् - त्यागने योग्य नहीं है , कार्यम् एव - कर्तव्य कर्म ही है , तत् - यह सभी , पावनानि एव - चित्तशुद्धिकर ही है , मनीषिणाम् - मनीषियों के लिए .

"यज्ञ दान व तपस्या त्यागने योग्य नहीं है, ये सभी अवश्य कर्तव्य कर्म है | यज्ञ दान व तपस्या रूप कर्म मनीषियों के चित्त को शुद्ध करने वाले है |"
त्याग के तीनो भेदों की व्याख्या करने से पूर्व श्रीभगवान यह स्पष्ट कर देना चाहते है कि यज्ञ दान व तपस्या कर्तव्य कर्म है अत: वे त्याग की श्रेणी में नहीं आते | यज्ञ दान व तप के भी पुन: तीन भेद है जिनका विस्तारपूर्वक वर्णन श्रीभगवान अध्याय १७ में कर चुके है |
bhagavad gita daan

एतान्यपि तु कर्माणि संगं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ६॥ 
एतानि - ये सब , अपि - भी , तु - किन्तु , कर्माणि - कर्म की , संगं - आसक्ति , त्यक्त्वा - त्याग कर , फलानि च - और फल (की आशा) का , कर्तव्यानि - कर्तव्य का , इति - यह , मे - मेरा , पार्थ - अर्जुन , निश्चितम् - निश्चय किया हुआ , उत्तमम् - उत्तम , मतम् - मत .

"हे पार्थ ! किन्तु ये सब (यज्ञ दान व तप) भी कर्म की आसक्ति और फल का त्याग करके करना चहिये | कर्तव्य के (विषय में) यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है |"
श्रीभगवान त्याग के विषय में पूर्वोक्त श्लोक २ व ५ के मध्य सामंजस्य करते है कि यद्यपि यज्ञ दान व तपस्या अवश्य ही कर्तव्य कर्म है किन्तु इनका भी वास्तविक त्याग तभी है जब इन्हें आसक्ति रहित होकर किया जाये । यही कर्त्तव्य (सन्यास) है ।


नियतस्य तु संन्यास: कर्मणो नोपपद्धते । 
मोहात्तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तित: ॥७॥

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥८॥

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेSर्जुन ।
संग त्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सात्विको मत: ॥९॥
   


to be continued...

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